नीली मक्खियाँ और पोल्ट्री का अंधा मुनाफ़ा: जनस्वास्थ्य की उड़ती हुई अनदेखी
Crime Journalist (सम्पादक – सेराज खान)

ब्यूरो चीफ सुल्तानपुर-आकृति अग्रहरि
“नीली मक्खियाँ और पोल्ट्री का अंधा मुनाफ़ा: जनस्वास्थ्य की उड़ती हुई अनदेखी”!
अखण्डनगर ,सुलतानपुर – पोल्ट्री फार्म से उठती दुर्गंध, उड़ती नीली मक्खियाँ और फैलता संक्रामक वातावरण—यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में उभरती एक कड़वी और कचरे में सनी सच्चाई है, जिसने अब जनस्वास्थ्य और नीति-निर्माण दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सुलतानपुर जनपद के बल्दीराय विकासखंड में बेलहरी गांव के पास स्थित पोल्ट्री फार्म से उठती असहनीय दुर्गंध और नीली मक्खियों की भरमार से स्थानीय निवासियों का जीवन नरक में बदल गया है। यहाँ न मास्क काम आ रहे, न मच्छरदानियाँ। यह समस्या मात्र एक गांव या ज़िले की नहीं, बल्कि उस सम्पूर्ण कृषि-प्रौद्योगिक ढांचे की है जो मुनाफ़े की अंधी दौड़ में नीति, पर्यावरण और मानवाधिकारों को रौंदता जा रहा है।
*नीली मक्खियाँ: अपशिष्ट से उपजे महामारी के वाहक*
नीली मक्खियाँ (ब्लोफ्लाईज़), सामान्य मक्खियों से आकार में बड़ी और अधिक तीव्र होती हैं। वे पोल्ट्री अपशिष्ट, मृत मुर्गियों के सड़ते अंगों, और खुले में फेंके गए खून, मल और अवशेषों से पनपती हैं। ये मक्खियाँ टाइफाइड, पेचिश, डिसेंट्री, गैस्ट्रोएन्टेराइटिस, आई इन्फेक्शन, चर्म रोग, और खाद्य जनित संक्रमणों का मुख्य स्रोत बन जाती हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए ये बीमारी जानलेवा भी सिद्ध हो सकती है।
*पोल्ट्री मुनाफा बनाम ग्राम्य जीवन*
भारत में पोल्ट्री उद्योग एक बड़ा आर्थिक आधार है, लेकिन यदि इसके संचालन में नियमों की अनदेखी की जाए तो यह लाभ नरसंहार में बदल सकता है। बेलहरी जैसी घटनाएँ साफ़ संकेत हैं कि हमारी नीति और निगरानी एजेंसियाँ असफल रही हैं। खुले में फेंके गए मुर्गियों के अवशेष, अपशिष्ट प्रबंधन के बिना निपटाया गया मलबा, और झाड़ियों में छिपी सड़ती लाशें — यह सब न केवल पर्यावरण को दूषित करता है, बल्कि लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर सीधा प्रहार करता है।
*भारत और विश्व में ऐसे ही भयावह उदाहरण*
2008 में हरियाणा के पंचकूला ज़िले में पोल्ट्री वेस्ट से उत्पन्न संक्रमण से सैकड़ों लोग बीमार पड़े थे। इसी तरह 2016 में चीन के ग्वांगडोंग प्रांत में पोल्ट्री अपशिष्ट के कारण H7N9 वायरस फैला, जिससे कई मौतें हुईं। भारत में महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी Bird Flu के मामलों ने पोल्ट्री प्रबंधन की लापरवाही को उजागर किया है।
*नियम-कानून: कागज़ पर सक्रिय, ज़मीन पर निष्क्रिय*
*सरकार द्वारा पोल्ट्री फार्म के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार:*
5,000 से अधिक मुर्गियों वाले फार्म को Environmental Clearance लेना अनिवार्य है।
ठोस अपशिष्ट को वैज्ञानिक विधि से निष्पादित करना होगा (Composting/ Incineration)।
फार्म 500 मीटर की दूरी पर आबादी से दूर होना चाहिए।
प्लास्टिक, खून और हड्डियों के निष्पादन हेतु Bio-medical Waste Management Rules 2016 का अनुपालन अनिवार्य है।
लेकिन बेलहरी में इन सभी नियमों की खुली धज्जियाँ उड़ाई गईं हैं।
*उत्तरदायित्व और दोष निर्धारण*
*इस भयावह स्थिति के लिए कई स्तर पर जवाबदेही तय करना आवश्यक है:*
फार्म मालिक: अपशिष्ट प्रबंधन न करने और आस-पास के नागरिकों की जान जोखिम में डालने के लिए प्रत्यक्ष दोषी।
स्थानीय प्रशासन: निगरानी और निरीक्षण की विफलता के लिए प्रशासनिक दोषी।
*पर्यावरण विभाग और ग्राम पंचायत: नीति और अनुपालन के स्तर पर लापरवाही।*
राज्य सरकार: ग्रामीण क्षेत्रों में नीति के क्रियान्वयन में संवेदनशीलता की कमी।
*व्यवस्थाकारों के लिए चेतावनी और आह्वान*
यदि समय रहते इस समस्या को नहीं रोका गया, तो यह केवल स्थानीय नहीं बल्कि ज़िला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर महामारी का कारण बन सकती है। व्यवस्थाकारों को यह चेतावनी दी जानी चाहिए कि यदि वे जनस्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ जारी रखते हैं, तो यह प्रशासनिक अपराध और नैतिक दिवालियापन दोनों की श्रेणी में आएगा। नियमानुसार कार्रवाई, लाइसेंस निरस्तीकरण और आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
*एक नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता*
हमें अब यह तय करना होगा कि हम केवल मुनाफे को प्राथमिकता देंगे या जनस्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन को भी सम्मान देंगे। इसका उत्तर केवल प्रशासन नहीं, समाज और नीति-निर्माताओं दोनों को मिलकर देना होगा।
*”यदि एक मुर्गी की जान की कीमत तय है, तो एक इंसान की साँसों का मूल्य भी सुनिश्चित होना चाहिए।”*
