अखण्डनगर, सुलतानपुर (उ.प्र.) – रात की ठंडी हवा में माँ का आशीर्वाद
Crime Journalist (सम्पादक – सेराज खान)

ब्यूरो चीफ सुल्तानपुर- आकृति अग्रहरि
प्रोफेसर (डॉ.) अखिलेश कुमार पांडे: माँ की गोद से गाँव की मिट्टी तक, और वहाँ से वैश्विक मंच तक — माँ के सपनों की उड़ान!
अखण्डनगर, सुलतानपुर (उ.प्र.) – रात की ठंडी हवा में माँ का आशीर्वाद!
सुल्तानपुर।अखण्डनगर की एक ठंडी रात। चाँद की शीतल धूप खेतों पर बिखरी है। एक छोटे से घर की कोठरी में माँ अपने बेटे के माथे पर हाथ फेरती है, हल्की मुस्कान और आँखों में आशा की चमक—“बेटा, हमारी मिट्टी, हमारा गाँव गर्व महसूस करे।” यही आशीर्वाद उनके जीवन का पहला दीपक बनता है। मिट्टी की खुशबू, माँ की कोमलता, और रात की खामोशी—इन सबने डॉ. पांडे के भीतर संकल्प की आग जला दी।
*गाँव की गलियों से विश्वविद्यालय की दहलीज़ तक: जड़ों से जुड़ी उड़ान*
सुबह की पहली किरण गाँव की गलियों में खेलते बच्चों पर पड़ती है। वही गलियाँ, वही धूल, वही मिट्टी, जो कभी उनके पैरों को छूती थी, अब उनके अनुभव और ज्ञान की राह में संजीव शक्ति बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों की चमक उनके कदमों को मोहित नहीं कर पाती, क्योंकि उनका दिल गाँव के बच्चों की हँसी, बुजुर्गों की चौपाल और खेतों की खुशबू में बसा है। जड़ें गहरी होने पर ही शाखाएँ आकाश को छू सकती हैं—और यही उनका जीवन-दर्शन है।
*1998 की रात: संघर्ष, अंधेरा और नया आरंभ*
रातें लंबी थीं और दर्द गहरा। मस्तिष्क-अर्बुद और पक्षाघात ने शरीर को जकड़ लिया। हर सांस एक चुनौती थी, हर पल एक परीक्षा। लेकिन डॉ. पांडे ने हार नहीं मानी। माँ की याद, गाँव की मिट्टी की गंध और उनके भीतर की जिजीविषा—ये सब उन्हें उठने और चलने की शक्ति देते रहे। उन्होंने अपने जीवन का मंत्र अपनाया—“संकट अंत नहीं, नया आरंभ है।” रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के साथियों, विद्यार्थियों और कर्मयोगी आत्मबल ने उन्हें पुनः शिक्षा के पथ पर खड़ा कर दिया।
*मिशन पालकी: कुलपति के रूप में शिक्षा का संजीव रूप*
कुलपति बनते ही डॉ. पांडे ने शिक्षा को जीवन और समाज से जोड़ने वाला मिशन बनाया। उनके नेतृत्व में एक नवीन संकाय, नौ विभाग और 300+ नवाचार-आधारित पाठ्यक्रम शुरू हुए। PM–RUSA से ₹100 करोड़, उज्जैन स्मार्ट सिटी से ₹30 करोड़, राज्य वन विभाग से ₹14 करोड़, मध्यप्रदेश क्रीड़ा संघ से ₹10 करोड़ और जनसहयोग से ₹40 लाख—संसाधनों का समेकित प्रबंधन।
कृषि, विधि, शारीरिक शिक्षा और न्यायिक विज्ञान से लेकर क्लाउड कम्प्यूटिंग और मानसिक मूल्यांकन तक, हर विषय ने छात्रों को जीवन और समाज के लिए तैयार किया। उनका मिशन पालकी यही कहता है—जितनी गहरी जड़ें, उतनी ऊँची शाखाएँ।
*शोध, लेखन और साधना: शिक्षा को कर्म बनाना*
तकनीकी सहायक से शुरू हुई यात्रा ने उन्हें 280 शोधपत्र, 35+ शोधलेख, 12 पुस्तकें, 65 शोधार्थियों का मार्गदर्शन और 21 परियोजनाओं का सफल संचालन दिया। ये आंकड़े नहीं, अनुशासन, धैर्य और कर्मयोग का जीवंत चित्र हैं। हर शोध और हर पुस्तक में मिट्टी की खुशबू, संघर्ष की धार और माँ के आशीर्वाद की छाया झलकती है।
*वैश्विक मंच पर मान्यता:* *Certificate of Excellence*
डॉ. पांडे को World Book of Records, London द्वारा Certificate of Excellence से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा की वैश्विक स्वीकृति है। उनके नवाचार-आधारित पाठ्यक्रम, बहुविषयक विस्तार और संसाधन-संग्रह ने विश्वविद्यालय को समाज और मूल्यों का केंद्र बना दिया।
*अखण्डनगर का लाल: माताओं का गर्व, गाँव का विश्वास*
अखण्डनगर(बहराभरी) की धरती आज गर्व से कहती है—“यह हमारा बेटा है, जो देश का गौरव है।” गाँव के बच्चे उनके साथ बैठकर सपने बुनते हैं, माताएँ आँसुओं और चमकती आँखों के साथ कहती हैं—“हमारे बच्चे भी कर सकते हैं।” मिट्टी से जुड़े रहकर भी दुनिया जीती जा सकती है—डॉ. पांडे की यही यात्रा मिशन पालकी को सार्थक बनाती है।
*निष्कर्ष: माँ की मुस्कान, मिट्टी की खुशबू और शिक्षा की उड़ान*
डॉ. पांडे का जीवन सिखाता है—माँ का आशीर्वाद, जड़ों का संबल और कर्म का समर्पण ही सफलता की असली सीढ़ियाँ हैं। शिक्षा केवल डिग्री नहीं, जीवन को दिशा देने की कला है। हर पाठक को यह अनुभव होता है—“हम भी कर सकते हैं, हमारे बच्चे भी कर सकते हैं।” यही मिशन पालकी की संजीव शक्ति है।
