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मनरेगा में शिक्षक की मजदूरी-व्यवस्था की दीमक बनते लोग

Crime Journalist (सम्पादक – सेराज खान)

ब्यूरो चीफ सुल्तानपुर-आकृति अग्रहरि

मनरेगा में शिक्षक की मजदूरी-व्यवस्था की दीमक बनते लोग।

अखण्डनगर/सुल्तानपुर – सार्वजनिक योजनाओं का उद्देश्य होता है—जनता के हक़ को सुनिश्चित करना। विशेषकर जब वह योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) जैसी हो, जो भारत के करोड़ों ग्रामीण श्रमिकों के जीवन में सम्मानजनक आजीविका की आशा का दीप जलाती हो। पर जब वही योजना भ्रष्टाचार की सुरंग में खो जाती है, तो न केवल सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि एक पूरी सामाजिक संरचना की नैतिक नींव हिलने लगती है।
हालिया समाचार के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जनपद के अखण्डनगर विकासखंड की ग्राम पंचायत धर्मपुर में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दर्शन नामक व्यक्ति, जो वर्ष 2007 से लखीमपुर खीरी स्थित एक इंटर कॉलेज में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं, उनका नाम मनरेगा मजदूरी करने वालों की सूची में पाया गया है। ग्रामवासियों द्वारा प्रस्तुत शिकायत के आधार पर आरोप है कि उन्हें मजदूरी का भुगतान भी किया गया है — वह भी तब, जब वे पूर्णकालिक शिक्षक पद पर आसीन हैं।
यह कोई तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे सुनियोजित भ्रष्टाचार की परतों में छिपा सच है। आरोप है कि ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की मिलीभगत से यह फर्जीवाड़ा लंबे समय से जारी है। शिकायत मिलते ही खंड विकास अधिकारी द्वारा चार सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया, जिसमें एडीओ, तकनीकी सहायक और अन्य अधिकारियों को सम्मिलित किया गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जांच समिति का गठन इस सामाजिक अपराध की गूंज को दबा पाएगा?

*व्यवस्था की आत्मा को छलते हाथ*

मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की आत्मा को आत्मनिर्भरता देने का उपक्रम है। पर जब इस योजना के भीतर वही लोग लाभ उठा लें जिनके पास पहले से नियमित वेतन और सरकारी सेवाएं हैं, तो यह उस निर्धन मज़दूर के हक़ का अपहरण है जो दो वक़्त की रोटी के लिए अपने हाथों से मिट्टी काटता है।
क्या यह त्रासदी नहीं है कि एक शिक्षक — जिसे बच्चों को नैतिकता, ईमानदारी और सेवा का पाठ पढ़ाना है — स्वयं नियमों की धज्जियाँ उड़ाता हुआ मनरेगा का ‘मज़दूर’ बन बैठा? यदि यह अनजाने में हुआ है तो लापरवाही, और जानबूझकर हुआ है तो अपराध की श्रेणी में आता है। दोनों ही स्थितियों में उसे सेवा में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं।

*सवाल केवल एक शिक्षक का नहीं है*

यह मामला केवल दर्शन नामक एक शिक्षक का नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों-हज़ारों फर्जी जॉब कार्डधारकों का प्रतिनिधि चेहरा है जो गाँवों की योजनाओं में नाम तो गरीब का रखते हैं, लेकिन पैसा ‘प्रभुत्वशाली’ का जेब भरता है।
यह घटना बताती है कि निगरानी तंत्र या तो निष्क्रिय हो चुका है या फिर उसी भ्रष्ट तंत्र में गुम हो गया है। अगर ग्राम पंचायत स्तर पर इस तरह की हेराफेरी खुलकर सामने आ रही है तो क्या यह समय नहीं है कि एक ब्लॉक स्तरीय स्वतंत्र ऑडिट टीम गठित कर समस्त ग्रामों का विवरण खंगाला जाए?

*विकेन्द्रीकरण के नाम पर ‘लूट की आज़ादी’?*

भारत की पंचायती राज प्रणाली विकेन्द्रीकरण की मिसाल कही जाती है। लेकिन जब ग्राम प्रधान और सचिव की मिलीभगत से जनकल्याण योजनाएं ही लूटी जाने लगें, तो यह विकेन्द्रीकरण नहीं, ‘विनियंत्रणहीनता’ का नमूना बन जाता है।
विकास की योजना केवल आंकड़ों में सफल दिखे और ज़मीनी हकीकत में खोखली निकले — यह लोकतंत्र के साथ छल है।

*न्याय नहीं, नज़ीर बने ये कार्रवाई*

खंड विकास अधिकारी ने कहा है कि पोर्टल से प्राप्त रिपोर्ट और जांच के आधार पर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। यह प्रशंसनीय वक्तव्य है — लेकिन अब वक्त ‘कठोर कार्रवाई’ के आश्वासन से आगे बढ़कर नज़ीर स्थापित करने का है।
जरूरत है कि दोष सिद्ध होने पर शिक्षक की सेवा समाप्ति की जाए, ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें अयोग्य घोषित किया जाए, और इस प्रकार के मामलों में आर्थिक दंड भी लागू किया जाए जिससे जनता के पैसे की प्रतिपूर्ति हो सके। तभी ऐसे लोगों को यह संदेश जाएगा कि योजनाओं में भ्रष्टाचार अब ‘जोखिममुक्त’ नहीं रहा।

*शिक्षक की भूमिका: प्रकाश देने वाला या परछाईं बढ़ाने वाला?*

शिक्षक, समाज का निर्माता होता है। उसकी भूमिका केवल किताबों के अक्षर भर नहीं, बल्कि समाज के नैतिक संस्कार गढ़ने की होती है। यदि वही व्यक्ति नीति और योजना को अपने निजी लाभ के लिए तोड़ता है, तो यह केवल उसके चरित्र की गिरावट नहीं, पूरे शिक्षा जगत की गरिमा पर आघात है।

*भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-जागरूकता की पुकार*

हर शिकायत पर कार्रवाई केवल तब तक कारगर है जब तक समाज में नैतिक चेतना जीवित है। अब आवश्यक हो गया है कि जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से ग्रामीण जनता को यह जानकारी दी जाए कि योजनाएं केवल दस्तावेज़ों की खानापूर्ति नहीं, बल्कि उनके अधिकार की गारंटी हैं।
ग्रामीण नागरिक स्वयं इस तरह के फर्जीवाड़ों को चिन्हित करें और आगे आकर प्रशासन से जवाब मांगें। जब जनता जागेगी, तभी तंत्र सुधरेगा।
यह एक समाचार नहीं, चेतावनी है। यदि अब भी नहीं चेते, तो एक दिन वे योजनाएं, जो गाँवों को खड़ा करती हैं, उन्हीं भ्रष्ट हाथों में गिरकर केवल आंकड़ों का कब्रिस्तान बन जाएंगी।