क्राइम जर्नलिस्ट/सम्पादक – सेराज खान

अमरोहा में मीट दुकानें बंद करने का आदेश हाईकोर्ट पहुंचा: 30 दिन दुकानें बंद करने पर हाईकोर्ट ने DM, SP से मांगा जवाब, इंस्पेक्टर तलब
प्रयागराज: अमरोहा में सावन महीने के दौरान कांवड़ यात्रा के चलते मीट, मछली और मुर्गे की दुकानें 30 दिनों तक बंद रखने का सरकारी आदेश अब कानूनी विवादों में घिर गया है। इस फैसले को अमरोहा के समाजसेवी और वरिष्ठ अधिवक्ता हाजी नासिर फारूक ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। राष्ट्रपति और उत्तर प्रदेश सरकार से राहत न मिलने के बाद उन्होंने यह कदम उठाया है।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने अमरोहा के DM और SP से इस संबंध में लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। इसके साथ ही, स्थानीय दुकानदारों को बिना नाम के नोटिस जारी करने वाले अमरोहा कोतवाली के इंस्पेक्टर को व्यक्तिगत रूप से तलब किया गया है।
अधिवक्ता हाजी नासिर फारूक ने स्पष्ट किया कि वह हिंदू धर्म और सनातन परंपराओं का सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा के मुख्य मार्गों पर व्यवस्थाएं बनाना उचित है, लेकिन प्रशासन का यह रवैया तर्कसंगत नहीं है।
फारूक ने सवाल उठाया कि जिन अंदरूनी रास्तों और गली-कूचों से कांवड़ यात्रा का कोई संबंध नहीं है, या जहां की आबादी पूरी तरह से अल्पसंख्यक है, वहां भी खान-पान और दुकानों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना अनुचित है। अधिवक्ता नासिर फारूक ने प्रशासनिक प्रतिबंधों के मानवीय पहलू पर जोर दिया।
अधिवक्ता ने बताया कि इन छोटे गली-मोहल्लों में रेहड़ी-ठेला लगाने वाले और छोटे दुकानदार रोजाना मुश्किल से 400-500 रुपये कमाते हैं। पूरे तीस दिन तक उनकी दुकानें बंद रहने से उनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने इस बात पर विचार नहीं किया कि ये गरीब परिवार एक महीने तक अपना भरण-पोषण कैसे करेंगे और बच्चों की स्कूल फीस व दवाइयों का खर्च कहां से लाएंगे, दुकानों का किराया कहा से जमा करेंगे, बिजली का बिल कैसे जमा करेंगे, अगर कोई बैंक लोन है तो उसकी ईएमआई कैसे जमा करेंगे, देश की अर्थव्यवस्था में सबका सहयोग होता है, अगर कोई बाइक में 100 रुपए का पेट्रोल या गाड़ी में 500 आदि का डीजल आदि भरवा रहा है तो वह भी अपरोक्ष रूप से टैक्स जमा कर रहा है।
एक किसान नेता ने यह कहा कि ठंडे दिमाग से सोचेंगे तो यह बात भी समझ में आएगी कि मीट व्यापार सिर्फ मुस्लिमों से जुड़ा हुआ कारोबार नहीं है बल्कि सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि मवेशी पालन सीधे सीधे देश के करोड़ों किसानों, करोड़ो मजदूरों, आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों आदि के अलावा ट्रांसपोर्टेशन से जुड़े लाखों लोगों आदि से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है, जिन लोगों के मुर्गी फार्म में मुर्गे बिक्री के लिए तैयार है वह लाखों रुपए रोज का दाना कैसे खिलाने की व्यवस्था करेंगे, जिन किसानों को अपने घर की भैंस बकरे बेच कर बच्चों के स्कूल कॉलेज की फीस जमा करनी है या अन्य कोई खर्चा है तो वह रुपए पैसे की व्यवस्था कहा से करेंगे ? नफरत की इस आंधी में ना मानवीय पहलुओं का ध्यान रखा जा रहा है और ना ही देश या देशवासियों की अर्थव्यवस्था के कमजोर होने की चिंता कर रहे हैं।
पुलिस, प्रशासन, समाज, न्याय प्रणाली, पत्रकारिकता आदि सभी को राष्ट्रहित में हमेशा निष्पक्ष रहना चाहिए।
