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रंगून की मिट्टी में दफ़न हैं हिंदुस्तान की आजादी का एक अधूरा सपना बहादुर शाह ज़फ़र

क्राइम जर्नलिस्ट(सम्पादक-सेराज खान)

रंगून की मिट्टी में दफ़न हैं हिंदुस्तान की आजादी का एक अधूरा सपना बहादुर शाह ज़फ़र।

नई दिल्ली।(ब्यूरो-अतुफा इशहाक)1857 की क्रांति की बात है… रमजान का 16वां रोजा था। लाल किले के झरोखे में बैठे बहादुर शाह जफर कुरान की तिलावत कर रहे थे। तभी मेरठ से आए बागी सैनिकों के शोर ने इतिहास की धारा बदल दी।

क्या थी वो मजबूरी जिसने सैनिकों को ‘बगावत’ पर मजबूर किया?
मसला सिर्फ नया ‘एनफील्ड राइफल’ नहीं था, मसला था ‘ईमान’ का। उन कारतूसों पर जो चर्बी लगी थी, उसे दांतों से काटना पड़ता था। अफवाह नहीं, हकीकत यह थी कि उसमें गाय और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल हुआ था।
हिंदू और मुसलमान, दोनों सैनिकों के लिए यह उनके धर्म पर सीधा हमला था। उन सैनिकों में ज्यादातर हिंदू भाई थे, लेकिन उन्होंने अपना नेता चुना 80 साल के एक बुजुर्ग बादशाह को। उन्होंने गुहार लगाई— “हुजूर, हमारे सिर पर हाथ रखिये, अंग्रेजों ने हमारा धर्म भ्रष्ट कर दिया है।”
एक बादशाह की वो कुर्बानी जिसे इतिहास भुला नहीं सकता:
बहादुर शाह जफर जानते थे कि इस उम्र में अंग्रेजों से टकराने का अंजाम क्या होगा, फिर भी उन्होंने कौम और वतन की खातिर कमान संभाली।
इसका अंजाम कितना खौफनाक था?
बहादुर शाह ज़फ़र ने उन सैनिकों की बात मानते हुए 1857 की क्रांति की कमान संभाली और इसका उन्हें बहुत भयंकर अंजाम भी भुगतना पड़ा।
कहा जाता है कि जब अंग्रेजों ने उन्हें कैद किया, तो मेजर हडसन ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा था—

“दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की,
ऐ ज़फ़र ठंडी हुई अब तेग (तलवार) हिन्दुस्तान की।”

तब 80 साल के उस बूढ़े बादशाह ने जो जवाब दिया, वो आज भी हर हिंदुस्तानी के रगों में जोश भर देता है:

“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख्त-ए-लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की!”

शायद ही इतनी बड़ी कुर्बानी किसी राजे-रजवाड़े ने दी हो.
* उनके बेटों के कटे हुए सिर थाल में सजाकर उनके सामने पेश किए गए।
* अपनी मिट्टी के लिए लड़ने वाले उस बादशाह को अपनी ही जमीन पर दो गज जगह तक नसीब नहीं हुई।
सोचने वाली बात:
अक्सर लोग कहते हैं कि मुगल भारत को लूटकर ले गए। लेकिन सच तो ये है कि भारत की आजादी की पहली बड़ी लड़ाई के लिए अपना सब कुछ, अपना खानदान तक लुटाकर एक बादशाह आज भी रंगून की गुमनाम मिट्टी में दफन है।

तस्वीर में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अखंड भारत के उस आखिरी बादशाह की कब्र पर खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश कर रहे हैं। यह तस्वीर गवाह है कि इतिहास के बलिदानों को कभी मिटाया नहीं जा सकता।