Crime journalist ( सम्पादक-सेराज खान)

ब्यूरो चीफ सुल्तानपुर-आकृति अग्रहरि

सरकारी मुकदमों में पैरवी शून्य, विनियमित क्षेत्र न्यायालय में नहीं पहुंच रहे सरकारी वकील!

अवर अभियंता की जांच रिपोर्ट पर दर्ज ‘राज्य सरकार बनाम…’ मामलों में नहीं रखा जा रहा शासन का पक्ष, भू-माफियाओं और अवैध निर्माणकर्ताओं को मिल सकता है लाभ।

सुल्तानपुर – नियत प्राधिकारी विनियमित क्षेत्र/उपजिलाधिकारी सदर न्यायालय में सरकार की पैरवी को लेकर एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। अवर अभियंता (अवर अभियंता विनियमित क्षेत्र) की जांच रिपोर्ट और नोटिस के आधार पर दर्ज होने वाले ‘राज्य सरकार बनाम…’ मुकदमों में शासन की तरफ से पक्ष रखने के लिए कोई भी सरकारी अधिवक्ता न्यायालय में उपस्थित नहीं हो रहा है। सरकारी पैरवी न होने के कारण इन महत्वपूर्ण फाइलों में शासन का पक्ष पूरी तरह से अछूता रह जाता है, जिससे सरकारी राजस्व और नियमों को ताक पर रखने वाले तत्वों को सीधा लाभ मिलने की आशंका गहरा गई है।
*अवर अभियंता की रिपोर्ट पर दर्ज होते हैं वाद*

विनियमित क्षेत्र के अंतर्गत बिना ले-आउट पास कराए या नियमों के विरुद्ध किए जाने वाले अवैध निर्माणों पर अवर अभियंता (जेई) द्वारा स्थलीय निरीक्षण कर जांच रिपोर्ट तैयार की जाती है। इस रिपोर्ट के आधार पर नियत प्राधिकारी (एसडीएम सदर) के न्यायालय में वाद दायर किया जाता है। नियमानुसार, इन मुकदमों में राज्य सरकार मुख्य पक्षकार होती है और सरकार की तरफ से पक्ष रखने व पैरवी करने की जिम्मेदारी सरकारी वकालतखाने (डीजीसी/एडीजीसी सिविल या विशेष प्राधिकृत अधिवक्ता) की होती है।
*लापरवाही: फाइलों में खाली पड़ा है सरकार का पक्ष*

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, नियत प्राधिकारी न्यायालय में जब इन मुकदमों की पेशी होती है, तो वहां राज्य सरकार की तरफ से कोई भी वकील पैरवी के लिए उपलब्ध नहीं होता। न्यायालय की फाइलों में सरकार की ओर से कोई लिखित जवाब या प्रभावी पैरवी दर्ज नहीं हो पा रही है। दूसरी तरफ, अवैध निर्माणकर्ता या विपक्षी दल अपने महंगे और निजी वकीलों के माध्यम से मजबूती से अपना पक्ष रख रहे हैं। सरकारी वकीलों की इस गैर-मौजूदगी के कारण मुकदमों में अनावश्यक देरी हो रही है या फिर एकतरफा मोड़ आने की संभावना बनी हुई है।

*राजस्व को चपत और अवैध निर्माण को बढ़ावा मिलने का खतरा*

जानकारों का कहना है कि अगर विनियमित क्षेत्र के मुकदमों में सरकारी वकील इसी तरह नदारद रहे, तो अवैध निर्माण करने वालों के हौसले बुलंद होंगे। इससे न सिर्फ शहर का मास्टर प्लान प्रभावित हो रहा है, बल्कि विकास शुल्क और शमन (कंपाउन्डिंग) फीस के रूप में सरकार को मिलने वाले लाखों-करोड़ों रुपये के राजस्व का भी भारी नुकसान हो रहा है।
इस पूरे मामले में अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर किसके निर्देश या ढिलाई के कारण सरकारी वकील इस महत्वपूर्ण न्यायालय से दूरी बनाए हुए हैं? क्या जिला प्रशासन और जिला शासकीय अधिवक्ता इस घोर लापरवाही का संज्ञान लेकर नियत प्राधिकारी न्यायालय में मुकदमों की प्रभावी पैरवी के लिए किसी विशेष अधिवक्ता को नामित करेंगे, या फिर सरकार के मामलों को इसी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया जाएगा?