ऐ “बादल” इतना “बरस” की “नफ़रतें” धुल जाएं

क्राइम जर्नलिस्ट(सम्पादक-सेराज खान)

*ऐ “बादल” इतना “बरस” की “नफ़रतें” धुल जाएं*

:*सम्पादकीय-लेखनिय/ऐ “बादल” इतना “बरस” की “नफ़रतें” धुल जाएं*…!!
*इंसानियत” तरस गई है “मोहब्बत” के “सैलाब” को*…!! उदास मंजर लिये सावन मास का आगमन हो गया लेकिन न माहौल में हलचल है न खेत खलिहानों में कलरव है।न सावन की कजरी की गीत है न प्रकृति की प्रफुल्लित करने वाली हवाओं से निकलने वाली संगीत है। सावन में आसमान मे उमड़ती घुमडती घटा‌,, मन्दिरो में बजते घंटा घड़ियाल हर हर बम बम के बोल साथ कावरीयो का उमड़ता जन सैलाब ,सावन की हरियाली में दरियादिली का नजारा, बाग बगीचों में झूलों पर झूलती बालाओं का समूह, खेतों में धान की रोपाई के समय कर्ण प्रिय रस बरसाती कजरी की गीत का प्रचलन खत्म हो गया।

अब न गांवों के करीब बाग बगीचे हैं न वो पुराने दरख्त जहां कमबख्त जिन्दगी बचपन की हसीन यादों को समेटे सिसकते मन से अब गुजर जाती है।

कलरव करते पक्षीयो का समूह ,कुलांचे भरते हिरनों का झून्ड,बरसात के आगमन की सूचना देते दादुरो के टर्र टर्र कि समूह मे‌ आवाज शाम के समय निशा के पहले पहर में जुगनुओ का मन बिभोर कर देने वाला छटा बिखेरता सैलाब जीव जन्तुओ की तरह तरह की आवाजें अब कुछ नहीं रह गया। सुबह उदास है तो शाम सूनी सूनी है दिन का मंजर दर्द लिये गुजर जाता है। सावन म से का आगमन का स्वागत प्रकृति से मन से कर रही है न रिमझीम बरसात है न कहीं हर्ष है न उल्लास है जिधर देखिये तबाही है! भुखमरी है! हर‌ कोई उदास है।

दिल में दहशत है कदम कदम पर जहमत है! मौत का ज़लज़ला है! जीवन के बचाव के लिये भागदौड़ अस्पतालों पर लोगों का लगा रेला है।किसी को पता ही नहीं चला की मानवीय दुर्बयवस्था का करारा जबाब दे रही प्रकृति का चल रहा खेला है।
देश का परिवेश पूरी तरह बदल गया।करोना के कहर से गांव और शहर दहल गया।दिक्षा परीक्षा शिक्षा की समीक्षा सरकार की इच्छा पर निर्भर हो गया है सारी सुख सुविधा रखते हुये भी आदमी का वजूद खो गया है।शिक्षा तंत्र के सब जहाज,बड़े इत्मीनान से डुबाये जा रहे हैं,!स्कूलों को बंद कर के लोग,रैलियों और मेलों में बुलाये जा रहे हैं?,तू लेता रह मुफ्त का राशन और तुक्ष सरकारी लाभ ! ऐ साधारण आदमी,
तेरे बच्चे जिस्म से नहीं,जहन से अपाहिज बनाये जा रहे हैं!

फिर भी हम आप खुश है धर्म मजहब का चश्मा जो हम आप लगाये हैं।

अब भी आंखें नहीं खुल रही‌ है मन्दिरों में कैद है भगवान! मस्जिदे में विरान है!

गिरजाघरों में देखा जा रहा है तबाही के निशान!वाहे गुरु के अरदास में भी पड़ गया ब्यवधान!

फिर भी मुस्करा रहा है देश का सम्विधान?

सियासत की अगेती खेती करने वाले रहनुमा बदनुमा दाग लगा दिये लोकतंत्र के करामाती चादर पर।

पैदा कर दिये तफरका जाति बिरादरी धर्म मजहब के नाम पर सियासी खेल में बे मेल कर दिये ब्यवस्था?

बदलाव की बहती गंगा में नंगा होकर‌ दंगा की सियासत नहीं चली तो आन्दोलन सम्ममेलन के माध्यम से‌ ही,समाज को विकृत करने का सूत्र इजाद कर जाति बिरादरी के नाम पर कर‌ रहे‌ है विभाजन? करोना की तीसरी लहर आगे बढ़ रही‌ है मौत दबे पांव इन्सानी बस्तीयों के तरफ चल रही है! सावधान रहें सतर्क रहें ?कल किसने देखा समय का परिवर्तन अन्त्तर्मन को झकझोर दिया है। सब कुछ खत्म हो गया है बस जिन्दा‌रहने के जुगत में लगे रहीये कभी तो अन्धेरा छटेगा।
जयहिंद-

सेराज खान / गोविन्द अग्रहरि / नितेश पाण्डेय / श्याम अग्रहरि

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